रविवार, 5 फ़रवरी 2017

तुलसी तहाँ न जाइये…..

“कहां जा रही मुनिया?”
“सहेली के यहां”
“अकेली?, भैया को लेती जाओ. न हो तो कल चली जाना. अभी इतना अंधेरा हो गया, लौटते-लौटते तो रात हो जायेगी.”
इतनी शाम गये, मुनिया को तैयार हो, अकेले घर से निकलते देख बाबूजी टोक बैठे.
मुनिया कोई जवाब दिये बिना पलटी, और पांव पटकते हुए अन्दर चली गयी.
“अम्मा, ये बाबू अगर इसी तरह टोकाटाकी करते रहे, तो हमारा तो जीना हराम हो जायेगा. इनसे कह दो, ज़्यादा रोक-टोक न किया करें, नहीं तो फिर हम भी ज़िद्द पे अड़ जायेंगे, हां कहे दे रहे…”  गुस्से के मारे नाक लाल करती मुनिया ने अम्मा को आड़े हाथों लिया.
“हां ठीक है, ठीक है, कह देंगे. लेकिन तुम लौट काहे आईं?”
“तो क्या करती? बाबू बाहर ही तो बैठे हैं. दिन रात वहीं बैठे रहते हैं. कहीं आना-जाना मुश्क़िल कर दिये हैं, सच्ची… अगर ऐसे ही बात-बात पे टोकते रहे तो हमारा तो पहनना-ओढना, आना-जाना सब बन्द हो जायेगा. “ लगभग रुआंसी आवाज़ में बोली मुनिया.
“अरे नहीं. हम समझायेंगे बाबू को. परिवार में रहे नहीं न बाबू, सो उनकी समझ में नहीं आ पा रहा यहां का रंग-ढंग. “
“अम्मा…ssssss….”
अभी मुनिया को दी जा रही समझाइश पूरी भी न हो पाई थी, कि बंटू के चिल्लाने की आवाज़ आई.
“का है बंटू, काहे चिल्ला रहे? का हो गया?”
“ अम्मा, इन बाबूजी को बताओ कि हमारा रुटीन क्या है. ये रोज़ –रोज़ की सफ़ाई देना हमें नहीं पुसाता. अभी कल भी निकलने लगे तो पूछ रहे थे, अब आज लौटे हैं, तो फिर पुछाई. अरे कहीं से चोरी डकैती कर के आ रहे क्या? ऐसे जानकारी लेने लगते हैं जैसे आधी रात को लौट रहे हों हम दबे पांव.” बंटू का पारा हाई था.
“अरे बेटा तुम तो जानते हो बाबू को……” अम्मा ने पुचकारना चाहा.
“न. हम नहीं जानते बाबू को. रहे हैं कभी हमारे साथ, जो हम जानेंगे उन्हें? ज़िन्दगी में पहली बार  एक महीने से देख रहे उन्हें, सो हलकान किये हैं सबको. ऐसा न चल पायेगा, बता देना उन्हें.” बंटू की भुनभुनाहट ज़रा तेज़ थी.
“अरे धीरे बोल बेटा. सुन लेंगे बाबू तो कितना बुरा लगेगा उन्हें?” बैठक के दरवाज़े की ओर देखते हुए अम्मा ने मुंह पर उंगली रख के धीरे बोलने का इशारा किया बंटू को.
“अरे कब तक धीरे बोलें, ये तो अब आ गये हैं परमानेंट…..” बंटू की आवाज़ में झुंझलाहट स्पष्ट थी.
“बंटू, तुम्हारे पिता हैं वे. ये घर उन्हीं के पैसों से बना है, जिसमें हम सब ठाठ से रह रहे हैं. जैसे हम हैं, वैसे ही वे हैं तुम्हारे लिये. इस तरह की बातें शोभा नहीं देतीं. यहां नहीं आयेंगे, तो कहां जायेंगे, रिटायरमेंट के बाद?” अम्मा को अच्छी नहीं लगी थी बंटू की बात. ये अलग बात है कि उनकी हद दर्ज़े की टोकाटाकी से अम्मा भी झुंझला जाती  थीं. ज़रा बाहर निकली नहीं कि कहां जा रहीं? क्यों जा रहीं? फ़लां सब्जी क्यों बनाई? रोटियां बहुत नरम नहीं बनीं. हमारा भोला बहुत अच्छी रोटियां बनाता था. ये बच्चे दिन भर कहां ग़ायब रहते हैं? बहू से कहो बाहर वालों से इतना खुल के न बतियाया करे. मुनिया कभी भी चल देती है, तुमने बहुत छूट दे रखी है. बिगाड़ दिया बच्चों को. अब इस उमर में सुधारने में बड़ी मुश्क़िल आयेगी, आदि..आदि…
बैंक में लिपिक सह रोकड़िया रहे बाबू, यानि कामता प्रसाद पांडे, किसी भी शहर में दो साल से ज़्यादा नहीं रह पाते थे. हर दूसरे साल ट्रान्स्फ़र. शुरु में जब बच्चे छोटे थे, तब अम्मा यानि उनकी पत्नी कुसुम साथ में रहती थीं, लेकिन जैसे ही बड़के की उमर कक्षा एक में दाखिले की हुई, पांडे जी ने अपने पुश्तैनी कस्बे में , अपने पुराने प्लॉट पर घर बनवा लिया. साल भर कुसुम यानि अम्मा किराये के घर में रहीं, और छोटे-छोटे बच्चों के साथ ही मकान बनवा डाला. बहुत मेहनत हुई उनकी. तब घर ठेके पर देने के बाद भी देखरेख करनी पड़ती थी. ऐसा बाबू कह गये थे. देखोगी नहीं तो का जाने कैसा मटेरियल मिला दे ठेकेदार. खून-पसीने की गाढ़ी कमाई थी, ऐसे कैसे व्यर्थ जाने देतीं अम्मा? सुबह दस बजे जो प्लॉट पर पहुंचतीं , तो दोपहर में ही घर आतीं. बड़के को स्कूल से लातीं, मुनिया बहुत छोटी  थी  उस वक़्त. खाना-वाना खा-खिला के फिर प्लॉट पर हाज़िर हो जातीं. मजदूरों के साथ जैसे खुद भी मजदूरी की उन्होंने. एक-एक ईंट अपनी देखरेख में लगवाई, सो बाबू से ज़्यादा अम्मा का जुड़ाव था इस घर से.
घर बनने में साल भर लग गया. बाबू बीच-बीच में आये, लेकिन दो-तीन दिन से ज़्यादा के लिये नहीं. उतने में हिसाब-किताब क्या समझते? सो पूरा ज़िम्मा अम्मा सम्भाले रहीं. बाबू पूरी तरह निश्चिन्त. केवल पैसा बैंक में डलवाते रहे. अम्मा ज़रूरत के मुताबिक निकालती रहीं. जब घर बन के तैयार हुआ, तब भी बाबू गृह प्रवेश के एक दिन पहले ही आ पाये थे. सारी तैयारियां अम्मा ने की थीं. घर बनने के दो साल बाद ही बंटू हुआ था. उस समय भी जेठानी आ गयी थीं कुछ दिन को. बाबू तो वही एक या दो दिन को ही आ पाते. 
मुनिया के स्कूल जाने की उमर होने पर अम्मा ने बाबू से कहा दाखिला करवाने को. बाबू, जो अब तक खुद अम्मा पर निर्भर हो चुके थे, सुनते ही बोले-“ तो हम का करें? तुम जानो. जहां बड़के पढ रहा, वहीं दाखिल करवा दो. “ अम्मा भी उनका जवाब जानती थीं जैसे, सो उन्होंने भी तो मुंह छूने भर के लिये पूछा था. एडमिशन फ़ॉर्म तो वे पहले ही ले आई थीं. अब मुनिया भी स्कूल जाने लगी थी. घर में रह जाते अम्मा और साल भर का बंटू. अम्मा बड़ी-पापड़, अचार, स्वेटर जाने क्या-क्या बनाने में व्यस्त रहतीं. बाबू हर दूसरे और आखिरी शनिवार को आते थे और सोमवार को बड़े सबेरे चले जाते थे. बच्चे केवल एक दिन उनके साथ रहते. बड़के और मुनिया  तो उनके साथ  तीन-चार साल रहे ही थे, लेकिन बंटू का उनके साथ रहना नहीं हो पाया था. बाबू जब आते तो बंटू दरवाज़े के पीछे छिप जाता. उनके सामने तक न निकलता. अजनबी निगाहों से देखता. बाबू गोद में लेने की कोशिश करते तो खूब ज़ोर से रोने लगता. बाबू गोद से उतार देते तो दौड़ के मां के आंचल में दुबक जाता. दो-चार महीने बाद ही बाबू का ट्रांस्फ़र कानपुर हो गया. अब वे घर से ज़्यादा दूरी पर पहुंच गये, सो हर पन्द्रह दिन में घर आने का सिलसिला भी टूट गया. अब वे हर महीने आते, दो दिन के लिये. या फिर कोई छुट्टी पड़ने पर. बच्चे अपने इर्द-गिर्द केवल मां को देख रहे थे. खाना बनाती, कपड़े धोती,  स्कूल ले जाती, रिज़ल्ट लेने जाती, पास होने पर मन्दिर ले जाती, होमवर्क कराती, कहानियां सुनाती, खिलौने दिलाती, साथ में खेलती अम्मा और सिर्फ़ अम्मा. सो अम्मा की हर बात, डांट, रोक-टोक, थप्पड़ सब मंज़ूर था तीनों बच्चों को. लेकिन बाबू…..
                           शाम को बड़के और बहू पिक्चर देखने जा रहे थे. तखत पर बैठे बाबू ने टोका-
 “ कहां जा रहे बड़के?” बड़के ने झिझकते हुए कहा-“ फ़िल्म देखने”
 अरे!! तो अकेले क्यों जा रहे? मुनिया और बंटू को भी ले जाते. साथ में ले जाओ वरना मुनिया फिर अपनी सहेली के साथ अकेले ही चल देखी फिल्म देखने.” बाबू ने आदेश सा देते हुए कहा.
“बाबू हमारे पास दो ही टिकट हैं.” बड़के अभी भी झिझक ही रहे थे.
“दो टिकट माने? और नहीं मिलेंगी अब? पहले ही बहन का टिकट लेना चाहिये था. यानी तुम उसे ले ही नहीं जाना चाहते थे. “ बाबू तनतनाये.
“ येल्लो अम्मा. बाबू का नया नाटक देखो. बेचारी भाभी जनम-करम में तो भैया के साथ निकल पाती हैं, उस पे बाबू हमें भी उनके ऊपर थोपना चाह रहे….” मुनिया की बात पूरी भी न हो पाई थी कि बहू झमकते हुए अन्दर आ गयी. आते ही पर्स एक ओर फेंक , धम्म से कुर्सी पर बैठ गयी. ये वही बहू है, जिसने शिक़ायत के लिये कभी मुंह खोला ही नहीं. हंसती-मुस्कुराती बहू सबके लिये हाज़िर रहती. ये अलग बात है कि अम्मा भी बहू पर जान न्यौछावर किये रहती थीं.उसे कभी अकेले रसोई में नहीं खटने दिया. आखिर ब्याह को हुआ ही कितना समय था, कुल तीन साल ही न! अम्मा ज़िद करके बड़के और बहू को घूमने-फिरने, शॉपिंग के लिये या फ़िल्म देखने भेजतीं. आज भी दोनों महीने भर बाद निकलने वाले थे, लेकिन बाबू ने सब गड़बड़ कर दिया. बड़के का भी मन उचट गया था फ़िल्म देखने जाने से. बाबू के आने के बाद से बहू वैसे भी अब खुल के बाहर नहीं निकल पाती थी, क्योंकि बाबू जी बैठक में तखत पर बैठे रहते या फिर बाहर बरामदे की आराम कुर्सी पर. दोनों स्थितियों में बाबू से सामना होना ही था. सालों बाद बाबू नाम के इस शख़्स को अपने बीच पा के वैसे भी बच्चे उनसे बहुत आत्मीयता जोड़ नहीं पा रहे थे. ऊपर से उनकी टोका-टोकी…
बाबू  भी क्या करें? जब यहां आये, अपने सामान सहित तो देखा कि घर पहले से ही सबके हिस्सों में बंट चुका है. घर में तीन बेडरूम, एक ड्रॉइंग रूम , रसोई, भंडारघर और पूजाघर है. बड़के की शादी के बाद एक कमरा उन दोनों का हो गया. एक कमरा बंटू और मुनिया के पढ़ने-सोने का. ये अलग बात है कि दोनों ही अलग-अलग समय पर पढ़ते सोते थे सो हमेशा लड़ते रहते थे. मुनिया कई बार कह चुकी थी कि उसे अलग कमरा चाहिये. एम.एससी. का अन्तिम साल है, रिज़ल्ट खराब नहीं कर सकती इस बंटू के चक्कर में. खैर….. बाबू के साथ काफ़ी सामान आया था, जबकि उनका कहना था कि आधे से ज़्यादा सामान तो वे भोला को दे आये हैं. फिर भी एक नया कूलर, खूब बड़ी बड़ी दो अलमारियां, बर्तनों का एक लोहे वाला बक्सा, दो बक्से भर के किताबें, तीन सूटकेस उनके कपड़ों के. जो कमरा अम्मा-बाबू का कहलाता था, वो पहले ही घर भर के अतिरिक्त सामानों से भरा पड़ा था, केवल एक तखत की जगह थी उस कमरे में अब तो कहना ही क्या! बाबू की अल्मारियां और सूटकेस किसी प्रकार अटाये गये वहां. अम्मा ने तखत निकाल के बैठक में डलवा दिया, और खुद अपने लिये फ़ोल्डिंग पलंग डाल लिया, क्योंकि उसी के लायक़ जगह बची थी वहां. बाबू का इंतज़ाम बैठक में किया गया. उनके लिये यहीं जगह बची थी. बाबू से ये कहते हुए अम्मा थोड़ा हिचकिचाईं भी, लेकिन क्या करतीं? कहना तो था ही.
                                   बाबू यानि कामता प्रसाद पांडे , नौकरी करते-करते थक गये थे. या घर से दूर रहते हुए अकेले पन ने उन्हें थका दिया था. पचपन का होने के बाद से ही अट्ठावन का होने के इंतज़ार में थे. ( तब अट्ठावन साल में रिटायर हो जाते थे न) चाहते थे कि जल्दी रिटायर हों, और घर पहुंचें. छुट्टी में जब भी घर जाते हैं, बच्चे कैसे आस-पास मंडराते रहते हैं. लेकिन केवल एक दिन बाद ही जब उन्हें वापस जाता देखते हैं, तो कितने रुआंसे हो जाते हैं. पांडे जी को ही कौन सा अच्छा लगता है बच्चों को छोड़ के जाना. लेकिन क्या करें? नौकरी न करें तो घर कैसे चले? पत्नी कुसुम भी कैसी खिल जाती है उन्हें देख के. बाबू की पसन्द की सब्ज़ी, उनकी पसन्द का रायता, कढ़ी, आलू के पराँठे, क्या-क्या नहीं बना डालती दो दिन के अन्दर. जाते समय कुछ न कुछ सूखा नाश्ता रख देती है कि ऑफ़िस से लौट के खा सकें. बच्चे छोटी-छोटी चीज़ें पा के कूदने लगते. बड़के और मुनिया उनके साथ कुछ साल रहे हैं, सो उनके ज़्यादा क़रीब हैं. बाबू-बाबू करते आगे पीछे घूमते हैं,. बंटू ज़रूर उनके साथ नहीं रह पाया सो थोड़ा दूर-दूर रहता है. लेकिन कोई बात नहीं. है तो उनका बेटा ही.
वे जब भी ज़रा लम्बी छुट्टी में आते तो जाते हुए पत्नी कहती-“ अब बहुत हुआ. ट्रांस्फ़र  हो पाता तो अच्छा था. हम भी अकेले गृहस्थी सम्भालते-सम्भालते उकता गये हैं.”  बच्चे उनके कंधे पर झूलते हुए पूछते-“ बाबू, तुम यहां क्यों नहीं रहते? नौकरी छोड़ दो न. हमें साइकिल पर घुमाने कोई नहीं ले जाता, तुम आ जाओ तो रोज़ घुमाओगे न?” बाबू की आंखें भर आतीं. झूठी तसल्ली देते- “ बहुत जल्दी आ जाउंगा बेटा. देखना, छोड़ दूंगा नौकरी.” लेकिन फिर ये वादा झूठा ही साबित होता. बड़के और मुनिया ने बड़े होते ही ऐसी ज़िद करना तो छोड़ दिया था, लेकिन उनके आने पर बेहद खुश और जाते समय उतने ही उदास हो जाते थे दोनों. फिर बड़के की शादी तक का मौका आ गया, बाबू रिटायर न हो पाये. बहू आ गयी और पत्नी, यानि कुसुम बहू के साथ व्यस्त-मस्त हो गयीं. मुनिया की भी शादी की उमर हो गयी थी. कुछ लड़के उन्होंने देख रखे थे, सोचते थे जा के आराम से चर्चा करूंगा कुसुम से. लेकिन यहां आने पर उन्हें महसूस हुआ कि घर के सारे हिस्से, यहां स्थाई रूप से रहने वालों के नाम हो चुके हैं. जो उनका कमरा था, उन्हीं  के अतिरिक्त सामान के चलते , भंडारघर में तब्दील हो चुका था. बैठक में उनकी व्यवस्था कर दी गयी थी, जैसे किसी भी आने-जाने वाले की ,की जाती है. जबकि बाबू चाहते थे, कि अपने खूब हवादार कमरे में बढिया डबल बेड डलवायेंगे और सफ़ेद नरम बिस्तर पर पत्नी कुसुम से खूब बतियायेंगे. पता नहीं कितनी बातें हैं बताने के लिये. मुनिया के रिश्ते सम्बंधी बातें भी तो रात में ही की जा सकती हैं. दिन भर तो वे पत्नी को चकरघिन्नी हुए ही देखते हैं. लेकिन अब उनका कमरा हवादार कहां? उन्हीं की अल्मारियों ने खिड़कियां ढंक दी हैं. एक तरफ़ कूलर रखा है, पैक किया, तो दूसरी तरफ़ उनके बक्से, सूटकेस. जो अल्मारियां पहले से थीं, वे तो थीं ही.
एक बात और महसूस कर रहे हैं बाबू कामता प्रसाद. बच्चों में कुछ अजब सा बदलाव हुआ है. पहले जब वे आते थे, तब जितना उत्साह और इंतज़ार इनके मन में होता था, उतना अब महसूस नहीं हुआ. उनकी किसी भी बात पर बच्चे जिस तरह पांव पटकते अन्दर जाते थे, वो उन्होंने देखा नहीं था क्या? जबकि सच तो ये है कि बाबू किसी पर कोई पाबन्दी नहीं लगाना चाहते, लेकिन आने-जाने का कुछ तो क़ायदा हो न? ज़माना इतना खराब है और शादी के लायक़ लड़की अकेली चल दी, डूबती सांझ में. कानपुर में तो उन्होंने ऐसे-ऐसे कांड देखे हैं कि अकेली लड़की को कहीं भी जाता देखते हैं, तो सोचते हैं कि इसे मैं ही पहुंचा आऊं क्या, जहां जा रही वहां. लेकिन  कर कुछ नहीं पाते. यहां का माहौल वैसा नहीं है, लेकिन अब माहौल की भली चलाई. कब कहां क्या हो जाये, कोई जानता है क्या? लेकिन कल मुनिया का पैर पटकते जाना, और फिर बंटू की बातें…… बाबू अपनी सफ़ाई देने कमरे के दरवाज़े तक पहुंचे ही थे, कि उन्हें बंटू की आवाज़ सुनाई दे गयी थी. क्या कह रहा था , वो भी.  कट के रह गये थे बाबू. परिवार के मनों में उनके लिये क्या जगह है, इस बात का अन्दाज़ा भी हो गया था बाबू को. उन्हें कानपुर का अपना एक कमरे का फ़्लैट याद आ रहा था, जहां भोला खाना बना के रख जाता था. उनकी हर बात सिर झुका के सुनने को तत्पर रहता था भोला. प्यार भी बहुत करता था. यहां प्यार तो दूर, इज़्ज़त का सुराग भी नहीं मिल रहा. 
रात को तखत पे लेटे तो उन्हें कानपुर की उस कोचिंग की याद आई, जो बैंकिंग सेवाओं के लिये कोचिंग देती थी. कितनी मनुहार की थी उसके संचालक ने. पच्चीस हज़ार दे भी रहे थे. कम नहीं हैं अकेले आदमी के लिये पच्चीस हज़ार. अभी बुढापा नहीं आया है जो बैठ जायें अशक्त हो के. पेंशन घर खर्चे के लिये काफ़ी है. फ़िर बड़के भी है अब तो ज़िम्मेदारी उठाने के लिये. बाबू ने तय कर लिया था, वे कल ही कोचिंग के संचालक को फोन करके अपनी सहमति दे देंगे.
सुबह बाबू बहुत फ़्रेश मूड में उठे थे. नाश्ता करके अपनी अटैची जमा रहे थे. अम्मा ने अचरज से देखा –“ अब कहां जाने की तैयारी है ? अटैची काहे लगा रहे?”
बाबू ने मुस्कुराते हुए अम्मा को देखा-“ अरे जानती हो, वो कोचिंग वाले हैं न पीछे पड़े हैं. कोई बहुत मेहनत का काम भी नहीं. कुल चार घंटे की नौकरी है. पैसा भी अच्छा ही दे रहे. इधर एक महीने से बेकार पड़े-पड़े ज़ंग ही लग गयी हाथ-पैरों में. सोचता हूं कि चला जाऊं. छुट्टी-छुट्टी आता रहूंगा. तुम चाहो तो चलो साथ में. यहां बच्चे सब समझदार हो गये हैं अब.”
बाबू के दोबारा जाने की खबर से अम्मा उदास तो हुईं, लेकिन दुखी नहीं. बच्चों के व्यवहार से वे भी दुखी थीं. बाबू के लिये कोई ग़लत बोले, ये भी उन्हें पसन्द नहीं और बच्चों की आज़ादी में बाबू खलल पैदा करें, ये भी उन्हें पसन्द नहीं. तो ऐसे में बाबू का दोबारा नौकरी करना उन्हें अखर नहीं रहा था. लेकिन खुद साथ चलने की बात पर बोलीं- “ साथ कैसे चलेंगे हम? अभी मुनिया है, बंटू है. बहू भी तो है. सब छोटे ही समझो. हां मुनिया के लिये अच्छा रिश्ता ज़रूर देखते रहना.”
जाते हुए बाबू ने पूरे घर पर नज़र डाली, और अम्मा से बोले-“ देखो कुसुम, सबका खयाल रखना और परेशान न होना. जब जी चाहे, आ जाना. मैं आता ही रहूंगा. एक बात और, अगली बार मेरा इंतज़ाम मेरे कमरे में ही करना, ताकि कुछ दिन टिक सकूं. बैठक में तो मेहमाननवाज़ी की जाती है, सो कर ली… ।

बाबू के जाने से बच्चे उदास थे, या निश्चिंत, अम्मा समझ नहीं पाईं, हां उन्होंने ज़रूर बैठक में आ के लम्बी सांस ली. पता नहीं , राहत की या उदासी की….।
चित्र: गूगल से साभार

शनिवार, 26 नवंबर 2016

डेरा उखड़ने से पहले….!

'डेरा उखड़ने से पहले' अब आप अपनी प्रिय पत्रिका सेतु की वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं, विश्वास है कि आप नीचे दिए लिंक पर चटका लगाने का कष्ट जरूर उठाएंगे। हाँ टिप्पणी वापस यहीं प्रदत्त की जा सकती है। 
http://www.setumag.com/2017/02/Vandana-Awasthi-Dubey-Hindi-Fiction.html

बुधवार, 29 मई 2013

सब तुम्हारे कारण हुआ पापा............

" How will you calculate the atomic mass of chlorine? "
"-------------------------------------------------------"
" नहीं  जानते ? "
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" A bus starting from rest moves with a uniform acceleration of 0.1ms-2 for 2 minutes , find the speed acquired , and the distance travelled.."
"-------------------------------------------------"
" जल्दी सॉल्व करो इसे."
................................................
" अरे! क्या हुआ? नहीं बनता? "
"..............................................."


" हद है! न कैमिस्ट्री न फिजिक्स ! कॉपी पर आड़ी टेढ़ी लाइनें खींचने से कुछ नहीं होगा . पढ़ाई में मन लगाओ वर्ना फेल हो जाओगे."
ज़रुरत से ज्यादा तेज़ आवाज़ हो गयी थी अविनाश की.
"पढ़ता तो रहता है बेचारा. तुम तो फालतू में ही चिल्लाने लगते हो."
बेटे के चेहरे की निरीहता बर्दाश्त नहीं हुई थी मालती से.
" पढता रहता है? अच्छा? तभी सारे विषयों में इतना अच्छा कर पा रहा है?  दो सड़े से सवाल पूछे, नहीं कर पाया. ये बात-बात पर पक्ष लेने के कारण भी सुधर नहीं पा रहे साहबजादे. जब मैं कुछ बोलूं, तो तुम चुप रहा करो.ढाल की तरह सामने मत आया करो. पढता तो रहता है, हुंह...."
कट कर रह गयी मालती. एक तो कभी पढ़ाते नहीं, उस पर अगर कहे-कहे पढ़ाने बैठ भी गए तो पता नहीं कहाँ -कहाँ के सवाल पूछने लगते हैं ! प्यार से पढ़ाना तो आता ही नहीं . वकील की तरह जिरह करने लगते हैं.
                        अविनाश भी कहाँ डांटना चाहता है? लेकिन पता नहीं कैसे डांटने लगता है? जबकि निरुत्तर बैठे गुड्डू की जगह हमेशा वो खुद को पाता है.
ठीक यही उम्र रही होगी  अविनाश की. नौवीं कक्षा में पढ़ता था, गुड्डू की ही तरह. पुराने ज़माने के कड़क पिताओं की तरह उसके पिता भी बहुत कड़क थे. हफ्ते में एकाध बार पढ़ाने ज़रूर बैठते थे, ख़ासतौर से रविवार को. संयुक्त परिवार था, सो सगे-चचेरे सब मिला के छह-सात भाई बहन पढ़ने बैठते. इतनी बड़ी क्लास के बच्चों की पढ़ाई पिता जी पहाड़े से शुरू करते.हद है! छटवीं से ले के ग्यारहवीं तक के बच्चे बैठे हैं, और पढ़ाई शुरू हो रही है पहाड़े से!! 
सबसे ज्यादा लानत-मलामत अविनाश की ही होती थी, क्योंकि उसे पहाड़े कभी याद नहीं होते थे. लिखते समय तो गिन-गिन के, गुणा करके लिख लिए, लेकिन पिताजी भी कम नहीं थे. जांचते समय वे १३, १८ और १९ का पहाड़ा ज़रूर सुनते थे. नहीं बनने पर कान खिंचाई. कान खिंचने की तक़लीफ़ से ज्यादा  तकलीफदेह उनकी बातें होतीं थीं. कान खींचना तो केवल भाई देखते थे, जबकि उनकी फटकार पूरे घर में सुनाई देती थी. वे डांटते कम थे, अपमानित ज्यादा करते थे.
औसत बुद्धि का था अविनाश. बहुत बढ़िया तो नहीं, पर ठीक-ठाक नंबरों से पास हो जाता था. फेल कभी नहीं हुआ.
ठीक उसी तरह गुड्डू है. औसत बुद्धि का है. परीक्षा के समय ही कायदे से पढ़ने बैठता है. बाकी पूरे साल पढने तो बैठता है, लेकिन पढता नहीं है. बस होमवर्क किया, और हो गयी पढ़ाई. जुट के पढ़ते देखा ही  नहीं कभी उसे. मन ही नहीं लगता उसका . उसके यार-दोस्त भी उसी के  जैसे मिल गए हैं.  शाम चार बजे से ही क्रिकेट का बल्ला लिए गेट के आस-पास घूमने लगते हैं. 
अविनाश के पिताजी हमेशा उसकी तुलना दूसरे लड़कों से करके उसे नीचा दिखाते रहते थे. शायद इसीलिये अविनाश ने कभी  गुड्डू की तुलना  दूसरे लड़कों से नहीं की. इस अपमान के दंश को खूब जानता है अविनाश. न. गलती से भी तुलना नहीं करता. बुरा तो उसे मालती का टोकना भी नहीं लगता. बल्कि चाहता है कि अगर वो गुड्डू पर बरसे, तो मालती खड़ी दिखाई दे गुड्डू के पक्ष में. ऐसा न हो कि उसकी माँ की तरह मालती भी सहम के पीछे खड़ी रहे.... जब पिताजी अविनाश पर गालियों की बौछार कर रहे होते थे,  तब अविनाश ने कितना चाहा कि उसकी माँ, उसका पक्ष ले, उसे बचा ले, लेकिन अविनाश के हिटलरी पिता का आतंक तो सब पर था। माँ चाह कर भी उसका पक्ष नहीं ले पाती थी। चाहती ज़रूर होगी , ऐसा अविनाश को  लगता है।
                                                       " सुनो, आज गुड्डू का रिज़ल्ट मिलेगा, तुम जाओगे लेने या मैं जाऊं? "
" तुम ही चली जाना मुझे शायद टाइम न मिले।"
राहत की सांस ली मालती ने। चाहती तो यही थी मालती कि रिज़ल्ट लेने अविनाश न जाएँ। क्या पता कम नंबर देख के वहीं भड़क गए लडके से डांट-डपट करने लगे? कोई  ठिकाना है क्या? लेकिन अब अविनाश को आड़े हाथों लेने का मौक़ा क्यों गँवाए ?
" तुम और तुम्हारा काम! दुनिया में जैसे और कोई  काम ही नहीं करता! सब नौकरी भी करते हैं और बच्चों का भी पूरा ध्यान रखते हैं। देखना, आधे से ज़्यादा जेंट्स ही आयेंगे वहां।"
लो! मन की भी हो गयी और चार बातें भी सूना दीं  :)
" ठीक है-ठीक है भाई मैं ही चला जाउंगा तुम रहने दो।"
अयं! ये क्या हो गया?
" न . रहने दो। जैसे अभी तक जाती रही हूँ, वैसे ही आज भी चली जाउंगी। तुम करो अपनी नौकरी।"
हँसी आ गयी अविनाश को।जानता है, मालती के मन में क्या चल रहा है। उसे जाने भी नहीं देना चाहती, और आरोप भी लगा रही है। मालती के झूठे   क्रोध को उससे बेहतर कौन जानेगा भला?
 इस बार B ग्रेड मिला था गुड्डू को। चलो ठीक ही है। 
" पापा , किताबें आज ही दिलवा दीजियेगा वरना  मिलेंगीं नहीं।" 
अपने ग्रेड से गुड्डू अतिरिक्त उत्साहित था। लग रहा था, जैसे बस अभी ही पढ़ाई शुरू कर देगा। 
शाम को अविनाश किताबें ले भी आये।
" पापा केवल टैक्स्ट बुक्स से कुछ नहीं होगा 40% बाहर से आता है। सभी सबजेक्ट्स की रिफरेन्स बुक्स, गाइड, और आर.के. शर्मा वाली मैथ्स की बुक भी चाहिए"
" ठीक है ले आऊंगा अभी इन्हें पढना शुरू करो।"
अगले दिन  अविनाश बुक-स्टॉल पर गया सारी किताबें देखीं इतनी सारी अतिरिक्त किताबें?? एक-एक यूनिट के सौ-डेढ़ सौ अतिरिक्त प्रश्न!! कैसे पढ़ पायेगा गुड्डू? अविनाश उसकी बौद्धिक क्षमता जानता है। लेकिन बच्चे को ये कहा भी तो नहीं जा सकता कि वो इतना सब नहीं पढ़ पायेगा .... देखूंगा बाद में. कुछ किताबें खरीद ली थीं, लेकिन अधिकांश छोड़ दी थीं अविनाश ने. गुड्डू से कह दिया कि एकाध महीने बाद सभी रिफ़ेरेंस बुक्स ला देगा.
गुड्डू को भी जैसे मुक्ति मिली. पहले ही इतनी किताबें देख-देख के हालत खराब हो रही थी.
शुरु में कुछ तेज़, और बाद में अपने ढर्रे पर चलने लगी उसकी पढाई. हां, बीच-बीच में पूरी गम्भीरता के साथ  अविनाश को याद दिला देता कि किताबें लानी हैं. अविनाश भी उसी गम्भीरता से किताबें लाने का वादा कर देता. 
अब जब परीक्षाओं को केवल दो महीने रह गये तो गुड्डू ने भी जल्दी-जल्दी याद दिलाना शुरु कर दिया, वो भी इस उलाहने के साथ, कि पूरा साल निकाल दिया पापा आपने!  कम से कम अभी ही रिफ़रेंस बुक ला दो. अब वैसे लाने से भी क्या फ़ायदा? कुछ याद तो करने से रहा. कब से कह रहा हूं आपसे फिर नम्बर कम आयेंगे तो आप ही गुस्सा करेंगे. 
आज भी गुड्डू  पापा को किताब लाने की याद दिलाता स्कूल चला गया . अविनाश ने उधर गुड्डू से हां कहा, इधर मालती ने उसे आड़े हाथों लिया-
" क्या बात है, बच्चे की किताबें ला के क्यों नहीं देते? खुद ही कहते हो, पढता नहीं है और जब बच्चा बार-बार याद दिला रहा है तो कुछ याद ही नहीं रखते."
" अरे मालती, जितनी किताबें ला के दी हैं, उतनी तो पढ डाले पहले. देखा नहीं, कुछ किताबें तो खुली तक नहीं. खैर, ले आउंगा आज ही."
"अब क्या ले आउंगा आज ही....कुल जमा एक महीना बचा है परीक्षा को. अब अपने कोचिंग के नोट्स तैयार करे, कि तुम्हारी किताब? लानी थी तो चार महीना पहले लाते..अब तो लाओ, न लाओ बराबर."
चुप लगा गया अविनाश. उसी दिन फिजिक्स की नयी रिफ़रेंस बुक ला के भी दे दी. 
गुड्डू ने भी भड़ास निकाली. 
"बहुत लेट कर दिये पापा आप. उधर कोचिंग में तो ये वाली पूरी बुक कब की करवा दी गयी. मैं  सॉल्व नहीं कर पाया क्योंकि मेरे पास बुक ही नहीं थी. अब देखिये कितना कर पाता हूं इस बुक से. भगवान भरोसे है रिज़ल्ट तो. क्योंकि सर कह रहे थे कि अधिकतर इसी बुक से आता है पेपर में "
अजब रोनी सूरत बना ली थी गुड्डू ने. लेकिन मन ही मन लाख-लाख धन्यवाद दे रहा था पापा को कि भला हुआ जो आप ये किताब इतनी देर से लाये, वरना इसका तो एक भी डेरिवेशन मेरी समझ में न आता.......... 
उधर अविनाश मन ही मन मुस्कुराये जा रहा था. उसकी मुस्कुराहट थम ही नहीं रही थी... खुद को तैयार कर रहा था रिज़ल्ट के बाद इस दोषारोपण के लिये कि केवल तुम्हारे कारण कम नम्बर आये पापा.....

शनिवार, 2 मार्च 2013

मेरी पसन्द........


इक बार कहो तुम मेरी हो........
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हम घूम चुके बस्ती-वन में
इक आस का फाँस लिए मन में

कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो

जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों

जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो

या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है

हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में

कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का

सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए

तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

0- इब्ने इंशा

सोमवार, 2 जुलाई 2012

कोई तो शर्मिंदा हो....


कोई मुम्बई जाये और हाज़ी अली की दरगाह पर ना जाये ऐसा हो सकता है क्या? हम भी पूरे भक्ति भाव से दरगाह पर गये।समंदर के बीच स्थित यह दरगाह सिद्ध दरगाहों में से एक मानी जाती है। समुन्दर के पानी को काट कर बनाया गया यह पवित्र स्थल लोगों ने इतना अपवित्र कर रखा है, कि दरगाह के प्रवेश द्वार से ही हर व्यक्ति को नाक बंद करनी पडती है। कचरा देख कर अफ़सोस होता है। प्रतिदिन जिस स्थान पर हज़ारों दर्शनार्थी मन्नत मांगने दूर-दूर से आते हों,उस स्थान की सफ़ाई व्यवस्था पर ध्यान देना ज़रूरी नहीं है क्या? यह तस्वीर तो मुझे मजबूरन उतारनी पडी, कम से कम कुछ लोग तो शर्मिन्दा हो सकें ,अपने द्वारा फैलाई गई इस गन्दगी को देखकर....

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

श्रद्धान्जलि......


सुप्रसिद्ध शायर/शिक्षाविद शहरयार साहब अब हमारे बीच नहीं हैं. लम्बी बीमारी के बाद कल रात उनका निधन हो गया. वे ७६ वर्ष के थे. यह रचना श्रद्धान्जलि-स्वरूप.

शहरयार : एक परिचय

16 जून 1936-13 फरवरी, 2012

वास्तविक नाम : डॉ. अखलाक मोहम्मद खान

उपनाम : शहरयार

जन्म स्थान : आंवला, बरेली, उत्तरप्रदेश।

प्रमुख कृतियां : इस्म-ए-आज़म (1965), ख़्वाब का दर बंद है (1987), मिलता रहूंगा ख़्वाब में।

अख़लाक़ मोहम्मद ख़ानविविध : 'उमराव जान', 'गमन' और 'अंजुमन' जैसी फिल्मों के गीतकार । साहित्य अकादमी पुरस्कार (1987), ज्ञानपीठ पुरस्कार (20
08)। अलीगढ़ विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफे
सर और उर्दू विभाग के अध्यक्ष रहे।
ज़िंदगी जैसी तवक़्क़ो थी नहीं, कुछ कम है
हर घड़ी होता है अहसास, कहीं कुछ कम है

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक़ यह ज़मीं कुछ कम है

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है, यकीं कुछ कम है

अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है

आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
यह अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है



सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

संत रविदास

मध्ययुगीन साधकों में संत रैदास का विशिष्ट स्थान है। निम्नवर्ग में समुत्पन्न होकर भी उत्तम जीवन शैली, उत्कृष्ट साधना-पद्धति और उल्लेखनीय आचरण के कारण वे आज भी भारतीय धर्म-साधना के इतिहास में आदर के साथ याद किए जाते हैं।

संत रैदास भी कबीर-परंपरा के संत हैं। संत रैदास या रविदास के जीवनकाल की तिथि के विषय में कुछ निश्चित रूप से जानकारी नहीं है। इसके समकालीन धन्ना और मीरा ने अपनी रचनाओं में बहुत श्रद्धा से इनका उल्लेख किया है। ऐसा माना जाता है कि ये संत कबीरदास के समकालीन थे। ‘रैदास कीपरिचई’ में उनके जन्मकाल का उल्लेख नहीं है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि इनका जन्म पंद्रहवीं शताब्दी में संत कबीर की जन्मभूमि लहरतारा से दक्षिण मडुवाडीह, बनारस में हुआ था। ( संत रविदास का यह परिचय जी की पोस्ट- संत रैदास से साभार.)

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी॥

प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा॥

प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती॥

प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।

प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै 'रैदासा॥